मेरे काव्यंश सिया की पीड से



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सिया की पीड़
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साक्षी ईश्वर रहा होगा
जीवन प्रीत संग होगा
सूर्य से चमकते भाल पे
कर्म अडिग सा रहा होगा1
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शीतल छाँव तले
प्रीत - प्राण खिले
स्वपन सुंदर मिले
उल्लासित हो जिए
जीवन क्यों ना जिए
पुलकित हो आज प्रिय
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मन्त्र-मुदित सिया हर्षाई
राम मुख देख हि लजाई
नयन कोर अश्रु छलकाए
पुलकित हो समझ ना पाए
आराधना राय "अरु"


सिया की पीड के अंश
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स्नेह से पूरित सिया का 
मधुमय स्वप्न साकार हुआ । 

लालिंमायुक्त रंजित सकल
राम का ह्दय आकाश हुआ ।

प्रसंग--राम से प्रथम सीता वाटिका में मिली थी। राम को देख लक्ष्मी रूपा जान गई थी कि राम ही विष्णु है । स्वयंवर के पश्चात सिया के मनोभावों का वर्णन किया गया है

सिया की पीड
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-"प्रीत- प्रेम सब अकारथ जाए
विपदा तुम्हारी सुनी ना जाए"

प्रसंग------प्रजा के आरोपों के पश्चात्
वाल्मिक आश्रम में सीता का दुःख सुनने
के बाद--अश्रु - विहल होकर
महर्षि ने कहा क्रोध मुनि का स्वभाव नहीं था ,
पर फ़िर भी अंधी और मुर्ख प्रजा पर खेद प्रकट
कर गुरु बोले

राम का वनवास
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ना तू काया , ना ही माया
किस का भेष तूने बनाया
प्रंसग--- सूर्पनखा की जब सुंदरी भेष में आई, 
तब राम जी को प्रसन्न करने के लिए,
उसने रूपसी का भेष बनाया.तब उसके ह्दय को देख
कर राम मुस्काए

आराधना राय "अरु"

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